श्री श्री बरम बाबा का मंदिर

श्री श्री बारमबाबा मंदिर का इतिहास और मंदिर परिसर में लगने वाले मेले का महत्व


श्री श्री बरमबाबा मंदिर दक्षिण असम के एक ऐतिहासिक तीर्थस्थल है। यह मंदिर दक्षिण असम अंतर्गत कछार जिले के शिलकुड़ी चाय बागान में स्थित है। कहा जाता है कि एक दैविक, तेजस्वी, पराक्रमी और चमत्कारी ब्राह्मण शिशु के समाधी स्थल पर यह मंदिर की स्थापना की गई है । जानकारों के अनुसार वह ब्राह्मण शिशु लंगटूराम नाम से जाने जाते थें, क्यों कि वह ब्राह्मण पुत्र अत्यंत कम उम्र के थें और हमेशा लंगोट पहने रहते थे इसलिए परिवार वाले तथा आसपास के लोग उन्हें लंगटूराम नाम से ही बुलाया करते थे । अब आइए जान लेते हैं कि मंदिर का नाम बरमबाबा कैसे पड़ा ? जबकि ब्राह्मण पुत्र की समाधी स्थल पर यह मंदिर की स्थापना की गई है इसलिए इस मंदिर का नाम बरमबाबा रखा गया था । बरम शब्द ब्रह्म शब्द के अपभ्रंश माना जाता है, और बरम शब्द के साथ बाबा शब्द जोड़कर इस मंदिर का नामकरण बरमबाबा रखा गया है। लेकिन इस मंदिर में पूजे जाने वाले भगवन् को लंगटूराम ब्राह्मण के नाम से ही जाना जाता है। और उनके मंदिर में आज भी लंगटूराम ब्रह्मणाय नमः लिखा जाता है।

जानकारों के अनुसार जब ब्रिटिश साम्राज्य ने असम में चाय उद्योग स्थापित करने की पहल की, तो वह देश के विभिन्न हिस्सों से लोगों को चाय उद्योग में काम करने के लिए लाते थे। इस कड़ी में असम में भी उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल से समूहों में लोग आए थे। कुछ लोगों के अनुसार ब्राह्मण पुत्र लंगटूराम अपने पिता के साथ उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से चाय बागान में काम करने वाले लोगों के एक समूह के साथ आए थे । वहीं कई लोगों का मानना यह भी है कि ब्राह्मण पुत्र लंगटूराम अकेले ही चाय बागान में काम करने वाले लोगों के एक समूह के साथ आए थे । 7 से 8 वर्ष की आयु में लंगटूराम ने ब्रह्म गायत्री प्राप्त कर लिए थे। सिर्फ यही नहीं वह पूजा, विवाह, बलि, यज्ञ आदि में भी निपुण थे। लंगटूराम पुजारी के परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आता था। ब्राह्मण संतान होने के कारण लंगटूराम सभी प्रकार धार्मिक समारोहों में भी शामिल होते थे।

उस समय चाय बागानों के अंग्रेज प्रबंधन, प्रबंधकों ने श्रमिकों को दास के रूप में इस्तेमाल किया करते थे। मानों अत्याचार और उत्पीड़न चाय मजदूरों का दैनिक साथी बन चुका था। अंग्रेजों द्वारा युवा लड़कों की उपेक्षा एवं चाय श्रमिकों पर अमानवीय अत्याचार दिन वा दिन बढ़ता जा रहा था । यह सब देखकर लंगटूराम बहुत चिंतित हो ग‌ए थे, उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा उत्पीड़ित नवागंतुकों के कष्टों को कम करने के लिए अंग्रेजों का विरोध भी किया था । इस विषय को लेकर एक दिन वह सीधे चाय बागान के मैनेजर/मालिक के पास चलें ग‌ए। उनको उम्मीद था कि बातचीत से कुछ हल होगा । लेकिन इसका परिणाम विपरीत हुआ, उन्हें उल्टा अपमानित होना पड़ा । वह अपने अपमान को सहन नहीं कर पाए और स्वेच्छा से शिलकुड़ी चाय बागान में यानी वर्तमान बरमबाबा मंदिर परिसर में स्थित एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचेे अपने शरीर को त्याग कर दिए । उनके मृृत्यु की खबर जैसे ही फैली चाय श्रमिकों में तनाव और दहशत फैल गई, वे स्तब्ध रह गए।

कहा जाता है कि उनके मृत्यु के बाद शिलकुड़ी चाय बागान तथा उसके आसपास के इलाकों में तरह तरह के अप्रिय घटना घटने लगे। जैसे कभी देर रात अचानक चाय बागान के फैक्ट्री की मशीन चलने लगती थी । कभी-कभी दिन में जब फैक्ट्री का रूटीन चल रहा होता था तब अचानक सभी मशीन खुद-ब-खुद बंद हो जाता था । चाय बागान प्रबंधन द्वारा कितने बार मशीन की मरम्मत के बाद भी यह सिलसिला जारी रहता था । कई बार क्षेत्र के कई घरों में एक साथ आग लग जाती थी । इस तरह शिलकुड़ी चाय बागान तथा उसके आसपास के इलाकों में क‌ई तरह के अनहोनी होने लगी । यह सब देखकर अंग्रेज प्रबंधन-प्रबंधक घबड़ा गए, डरने लगे। लोगों में अफरातफरी मच गई। सबको लगनेे लगा लंगटूराम एक ब्राह्मण बच्चा था और वह अपने अपमान को सहन ना करने के कारण ही अपने शरीर का त्याग किया था । जिसके कारण उसके मृत्यु के बाद इस तरह के अनचाहे घटना घट रही है। इलाके के ब्राह्मण, धर्म प्रेमी तथा बुद्धिजीवियों के परामर्श से लोग लंंगटूराम के समाधी स्थल पर पूजन अर्चना करना आरंभ कर दिए । मानना यह है कि पूजन अर्चन आरंभ करने बाद धीरे-धीरे लोगों की परेशानी कम होने लगा । लोग उनके पास जाकर जो भी मन्नतें मांगते थे वह बिना विलम्ब के ही पुरा होने लगा । देेखते ही देखते यह बात पुरे घाटी में फैल गई । दूर दूर से लोग उनके समाधी स्थल पर पहुंचकर पूजा अर्चना करने लगे । धीरे धीरे लंगटूराम पर लोगों की आस्था बढ़ता गया । लोग उन्हें देव तुल्य मानने लगे और माने भी क्यों नहीं क्योंकि मात्र 7/8 साल उम्र में ही लंगटूराम ब्रह्म गायत्री प्राप्त कर लिए थे, वह पूजा, विवाह, बलि, यज्ञ आदि में भी निपुण थे। जो एक साधारण मनुष्य के लिए असंभव है । जानकारों के माने तो एक मारवाड़ी व्यवसायी का एक छोटा बच्चा दूसरे मंजिल से नीचे गिर रहा था तभी उसके माता-पिता ने बरमबाबा को सुमिरन किया और ताजुब की बात यह है कि एक छोटा बच्चा दूसरी मंजिला से नीचे गिरा और चुपचाप उठकर बैठ गया, और उस बच्चे को खरोंच भी नहीं आया । यह चमत्कार देखकर उस बच्चे की माता पिता दूसरे दिन ही बच्चे की वजन के बराबर लडू लाकर बरमबाबा की चरण में रखें । वैसे ही एक रात की बात है कि एक घर में कुछ लूटेरे घूंसे हुए थे, लूटेरों को देखकर पति-पत्नी दोनों पलंग के नीचे जा छिप गए और तत्कालीन लंगटूराम एवं वर्तमान बरमबाबा नाम से जाने जाने वाले ब्राह्मण पुत्र के नामों के जाप करने लगे । ताजुब की बात यह है कि लूटेरों ने घर के कौने कौने को तथा घर में रखा गया सामाग्री को तलवार से काट काट कर तितर बितर कर दिए लेकिन पलंग के नीचे देखा तक नहीं और वहां से चले गए । दूसरे ही दिन दंपति ने बरमबाबा के धाम पहुंचकर बाबा के पिंड में माथे टेक कर फूट फूटकर रोने लगे। ऐसे और अनगिनत घटनाएं हैं जिससे धीरे-धीरे लंगटूराम के प्रति लोगों में श्रद्धा, विश्वास और आस्था बढ़ता गया ।

इधर ब्राह्मण पुत्र लंगटूराम के प्रति लोगों में बढ़ती हुई आस्था एवं विश्वास को देखते हुए शिलकुड़ी चाय बागान के अंतर्गत शिलकुड़ी, तथा शिलकुड़ी चाय बागान के फाड़ी चाय बागान भोराखाई, धरमखाल एवं दूर्गाकोना चाय बागान के स्थानीय लोगों ने निश्चय किया कि ब्राह्मण पुत्र लंगटूराम के समाधी स्थल पर एक स्थायी मंदिर बनाई जाए । यहीं से बरमबाबा मंदिर निर्माण का सिलसिला आरंभ हुआ । और देखते ही देखते लंगटूराम के समाधी स्थल पर श्री श्री बरमबाबा का मंदिर नाम से एक स्थायी मंदिर का निर्माण किया गया। इधर ब्राह्मण पुत्र लंगटूराम जिस बरगद के पेड़ के नीचे समाधी लिए थे वह पेड़ देखते ही देखते विशालकाय आकार में तब्दील हो गया था । उस बरगद पेड़ का डाल इतने फैलने लगा कि वर्तमान सिलचर-असम विश्वविद्यालय मार्ग तक पहुंच गया । जिससे आने-जाने वाले लोग तथा वाहनों की आवाजाही पर बाधा होने लगा। लेकिन इस पेड़ को अथवा डाल को काटने की साहस किसी में नहीं था । कुछ जानकारों की मानें तो एक-दो लोग इस पेड़ के डाल को काटने की साहस जुटाए थे, लेकिन उनके साथ क‌ई तरह की अनहोनी होने लगी, कुछ जानकारों के मुताबिक पेड़ से रक्त के भांति लाल रंग की रस निकलने लगता था। इधर आने-जाने वाले लोगों की समस्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही थी। तब मंदिर के सभी पुजारियों ने बरमबाबा से मन्नत मांगी की पांच किलो लड्डू चढ़ाकर बरमबाबा को शांत किया जाएगा और डंठल काट दिया जाएगा। लेकिन इसी बीच बरमबाबा ने सपने में एक पुजारी से कहा पांच किलो लड्डू नहीं बल्कि महाविष्णु यज्ञ करना पड़ेगा अंत में महाविष्णु यज्ञ करने का निर्णय लिया गया.